Friday, February 19, 2010

तुमने क्या सोचा...


तुमने क्या सोचा मैंने क्या समझा
इस ना समझी मैं बरसो गुजर गए
हर पल हर दिन उस सोच पर पछताता रहा
आँखों मैं आंसू दिल मैं कसक और
जुम्बा पर दर्द सहलाता रहा
अब हिम्मत नहीं थी नजरे उठाकर चालू
नजरों के सामने अन्धेरा छाता रहा
जब ठोकर लगी पैरों मैं आह तक नहीं निकली मुह से
लेकिन ये दर्द पल-पल गहराता रहा
अब अकेला हूँ ''साथ'' से डरता हूँ
यही वहम उम्र भर सताता रहा
हर दिवार हर कोने मैं उसी की तस्वीर दिखती हैं
बस नजरो से युही मन को बहलाता रहा....

4 comments:

www.जीवन के अनुभव said...

are vah aap to bahut achchhe kavi he.

sandeepharyanvi said...

SUNIL SAHAB, ACHCHI KOSISH KAR RAHE HAIN AAP......BHAV HAIN AAPKE PAAS, THODA SA UNKO SHABDON KI CHATURAI DENA AUR SEEKHEIN......AALOCHNA NAHIN KAR RAHA HOON......TAKE IT POSITIVE...BASS MAIN TO SOCH RAHA HOON KI JIS TARAH KI CHOICE AAPKI PADHNE KI HAI WAISA AAP LIKH PAAYEIN.............


SANDEEP

Shilpa kumrawat said...
This comment has been removed by the author.
Shilpa kumrawat said...

nice poetry,,,,,,,invites u to join kumrawat's blog -http://www.tambolikumrawat.blogspot.com/..........shilpa